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अनुकंपा नौकरी पर बड़ा फैसला: परिवार में कमाने वाला सदस्य होने पर नहीं मिलेगा लाभ, पटना हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

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पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि मृतक कर्मचारी के परिवार में पहले से कोई कमाने वाला सदस्य है तो अनुकंपा नियुक्ति का दावा स्वीकार नहीं किया जाएगा। बेगूसराय के एक मामले में कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

पटना/आलम की खबर:पटना हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक अहम और दूरगामी प्रभाव डालने वाले फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार में पहले से कोई कमाने वाला सदस्य मौजूद है और वह परिवार का भरण-पोषण करने में सक्षम है, तो ऐसे मामलों में अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी का दावा स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह निर्णय न केवल बिहार बल्कि पूरे देश में अनुकंपा नियुक्ति नीति को लेकर एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश माना जा रहा है।

यह मामला बेगूसराय जिले से जुड़ा हुआ है, जहां सिट्टू कुमार नाम के एक व्यक्ति ने अपने दिवंगत पिता की जगह अनुकंपा के आधार पर नौकरी की मांग की थी। उनके पिता बिनोद शर्मा बिहार स्पेशल आर्म्ड पुलिस (BSAP) में हवलदार के पद पर कार्यरत थे और उनका निधन 10 मार्च 2016 को हो गया था। पिता की मृत्यु के बाद परिवार ने आर्थिक संकट का हवाला देते हुए अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था।

हालांकि, जिला अनुकंपा समिति ने आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता के बड़े भाई पहले से सरकारी नौकरी में कार्यरत हैं और परिवार की आजीविका चलाने में सक्षम हैं। समिति का मानना था कि जब परिवार में पहले से एक स्थायी आय का स्रोत मौजूद है, तो अनुकंपा नियुक्ति का आधार कमजोर हो जाता है।

इसके बाद सिट्टू कुमार ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए पटना हाईकोर्ट का रुख किया। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उनका बड़ा भाई अलग रहता है और परिवार के भरण-पोषण में योगदान नहीं देता, इसलिए उन्हें अनुकंपा नियुक्ति मिलनी चाहिए।

लेकिन कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

Patna High Court ने स्पष्ट कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल तभी पूरा होता है जब परिवार अचानक आए आर्थिक संकट से जूझ रहा हो और उसके पास कोई भी स्थायी आय का साधन न हो। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था “सामाजिक सुरक्षा का उपाय” है, न कि नौकरी देने का सामान्य विकल्प।

कोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में पहले ही जिला अनुकंपा समिति द्वारा उचित विचार-विमर्श के बाद आवेदन को अस्वीकार किया गया था। इसके बाद 2022 में हाईकोर्ट ने एक अन्य आदेश के तहत बिहार पुलिस महानिदेशक को मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था, जिसमें नीरज कुमार मलिक बनाम बिहार राज्य मामले का संदर्भ दिया गया था।

निर्देश के अनुपालन में पुनः सुनवाई हुई और 28 जुलाई 2023 को समिति ने एक बार फिर आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद मामला दोबारा हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने समिति के निर्णय को सही ठहराया और याचिका को खारिज कर दिया।

इस पूरे मामले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का लाभ “समानांतर रोजगार का विकल्प” नहीं हो सकता। यदि परिवार में कोई एक सदस्य भी पर्याप्त रूप से कमाने वाला है, तो इसे आर्थिक असहायता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे कई मामलों पर असर डालेगा, जहां परिवार के सदस्य नौकरी को लेकर अनुकंपा का दावा करते हैं लेकिन वास्तविक आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

इस निर्णय के बाद बिहार में अनुकंपा नियुक्ति नीति को लेकर नई व्याख्या सामने आई है, जिसमें “परिवार की समग्र आर्थिक स्थिति” को सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाएगा, न कि केवल मृतक कर्मचारी की स्थिति को।

मामले में Bihar Police और जिला प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही, क्योंकि प्रारंभिक स्तर पर जांच और दस्तावेजों के आधार पर ही आवेदन को अस्वीकृत किया गया था।

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